“হাত” {লেখাটি দাশুর ডাইরি থেকে , অন্যনিষাদ/ গল্পগুচ্ছ ও সুপ্ত প্রতিভা-Supto Protibhaপত্রিকায় প্রকাশিত।}

Self (42)বেঁধে,  বেঁধে –রক্ষে,  রক্ষে– বাস  দাঁড়  করান,  বলে  একটা  বিরাট  চিৎকার,  তার  পরেই  ব্রেক  কষার একটা  প্রচন্ড  আওয়াজ।  আর  ঠিক  তার  পরেই  চারিদিক  থেকে  ছুটে  আসা  জনতার  ভিড়।  কেউ  বলে আ-হা-হা,  কতই  বা  বয়স?  এই  বয়সেই  ভবলীলা   শেষ।  কেউ  বলে  বেঁচে  আছে,  হসপিটাল  নিয়ে  যাও। ট্যাক্সি,  এই  ট্যাক্সি।  কেউ  বলে  বাঁচলেও  বাকী  জীবনটা  পঙ্গু  হয়েই  থাকতে  হবে।  কিন্তু  কথা  ছাড়া, কাউকে  কিন্তু  কোনরকম  সাহায্য  করতে  দেখা  গেল  না।

শেষে  একটা  টানা  রিক্সাওয়ালা  জখম  ছেলেটাকে  তার  রিক্সায়  তুলে  দৌড়  লাগালো।  উদ্দেশ্য,  স্থানীয়  কোন  হাসপাতাল  বা  নার্সিং  হোম।  কিছু  উৎসাহী  জনতা  রিক্সার পিছন  পিছন  প্রায়  ছুটেই  তাকে  অনুসরণ  করলো।  বাকী  সব  যে  যার  রাস্তা  ধরলো।  ভাবটা  অনেকটা– যেচে  কে  আর  পুলিশের  ঝামেলায়  জড়ায়?

কলকাতা  শহরে  রোগী  হিসাবে  হাসপাতালে  ভর্তি  হওয়ার  থেকে,  ডাক্তারি  পাশ  করে  হাসপাতালে  চাকরী  পাওয়া  সহজ।  যাহোক্,  শেষে  গরীব  রিক্সাওয়ালা  ও  দু’-চারজন  উৎসাহী  জনতার  আন্তরিক  প্রচেষ্টায়,  ছেলেটাকে  একটা  সরকারী  হাসপাতালে  ভর্তি  করা  হ’ল।  কিন্তু  বাধ  সাধলো  নিকট  আত্মীয়  স্বজন।  সঙ্গে  আসা  সঙ্গীসাথীদের  মধ্যে  কেউ  তার  পরিচিত  বা  আত্মীয়  নয়  জেনে,  ডাক্তাররা  বেঁকে  বসলেন।  এটা  পুলিশ  কেস,  পুলিশ  এসে  রিপোর্ট  না  নেওয়া  পর্যন্ত,  চিকিৎসা  শুরু  করা  বোধহয়  ঠিক  হবে না।

একজন  ডাক্তার  এগিয়ে  এসে  বললেন– “আপনাদের  মধ্যে  কে  কে  একে  চেনেন”?

সবাই  চুপ।

তার  মানে  আপনারা  কেউ  একে  চেনেন  না।  যাহোক্,  আপনারা  কেউ  চলে  যাবেন  না।  পুলিশ  এলে  প্রশ্নের  উত্তর  দিতে  হতে  পারে।

এবার  দেখা  গেল  কী  ভাবে  হাসপাতাল  থেকে  কোন  মতে  পালানো  যায়,  তার  প্রতিযোগিতা।

আমার  স্যার  স্ত্রীর  খুব  অসুখ,  আমি  বাড়ি  গেলে  ওষুধ  পড়বে।

আমার  স্যার  বাড়ি  ফিরে  মেয়েকে  কোচিং  ক্লাশ  থেকে  নিয়ে  আসতে  হবে।  জায়গাটা  মোটেই  ভাল  নয়।

আমার  স্যার………

চুপ।  আপনাদের  লজ্জা  করে  না?  একটা  জলজ্যান্ত   ছেলে  মরতে  বসেছে,  আর  আপনাদের  কিছুই  করণীয়  নেই?  ছেলেটা  কে,  কোথা  থেকে  আসছিল,  কোথায়  যাচ্ছিল,  কোন  খবর  আপনারা  জানেন  না?  এখানে  নিয়ে  এলেই  দায়িত্ব  শেষ?  ডাক্তাররা  কী  ভগবান?  কেউ  বাড়ি  যাবেন  না,  পুলিশ  এলে  যা  বলার  বলবেন। রিক্সাওয়ালাটা  কিন্তু  মাথায়  গামছা  বেঁধে,  গালে  হাত  দিয়ে,  একপাশে  বসে  আছে। একবারও  ভাবছে  না,  আজ  তার  গোটা  দিনটার  রোজগার  মাঠে  মারা  গেল।  আজ  এখন  পর্যন্ত  একটি  মাত্র  যাত্রী  সে  পেয়েছে,  কিন্তু  তার  কাছ  থেকে  কোন  টাকা  নেবার  কথা  সে  ভাবতেও  পারে  না।  আর  দেবেই  বা  কে?

ছেলেটাকে  মাটিতে  শুইয়ে  রাখা  হয়েছে।  বেড  নেই,  না  পুলিশ  আসার  অপেক্ষা, বোঝা  গেল  না।  ডান  হাতের  কনুই  পর্যন্ত  বাসের  চাকা  থেঁতলে  দিয়ে  গেছে। জায়গাটা  রক্তে  লাল।

কিছুক্ষণ  পরে  একজন  এসে,  সম্ভবত  কোন  ওষুধ  দিয়ে  হাতটা  পরিস্কার  করে,  তুলো  জড়িয়ে,  ব্যান্ডেজ  বেঁধে  দিয়ে  গেল।  তারপর  সম্ভবত  চললো  পুলিশের  প্রতীক্ষা।

প্রতীক্ষা।  ছেলেটার  মৃত্যুর  প্রতীক্ষা,  সঙ্গে  আসা   লোকজনের  বাড়ি  ফেরার  প্রতীক্ষা,  ডাক্তারদের  পুলিশের আগমনের  প্রতীক্ষা,  নির্বিকার  গরীব  রিক্সাওয়ালা  কিসের  প্রতীক্ষায়  গালে  হাত  দিয়ে  বসে  আছে  কে  জানে।

আস্তে  আস্তেে  বেলা  বাড়তে  লাগলো।  অবশেষে  দু’জন  পুলিশ  এলেন।  বোধহয়  হাসপাতাল  থেকেই  খবর  দেওয়া  হয়েছিল।  তারা  আহত,  মৃতপ্রায়  ছেলেটার  ওপর  ঝুঁকে  পড়ে  ভাল  করে  দেখলেন।  পুলিশের   পোষাক  পরে  আছেন  তাই,  তা  না  হলে  এদের  রোগী  দেখার  কায়দা  দেখে,  ডাক্তার  বলে  ভুল  হতে  পারে।  এরপর  শুরু  হ’ল  পুলিশি  কায়দায়  প্রশ্নবান।

“কে  কে  এর  সাথে  এসেছেন  এগিয়ে  আসুন”।  তিনজন  ভয়ে  ভয়ে  এগিয়ে  এল।  একজন  শুধু  বসে  থাকলো,  পাশে  রিক্সাওয়ালা।

“কী  হয়েছিল  বলুন।  ঠিক  ঠিক  বলবেন,  কোন  কিছু  চেপে  যাবার  চেষ্টা  করে  অযথা  বিপদ  ডেকে  আনবেন  না”।

“স্যার,  ছেলেটা  বাস  থেকে  নামতে  গিয়ে  পড়ে  যায়,  আর   পিছনের  চাকায়   সে  চাপা  পড়ে।  ও  স্যার  একবারে  সামনে  থেকে  দেখেছে”,  বলে  চতুর্থ  ব্যক্তিটি,  যে  দুরে  রিক্সাওয়ালার  পাশে  বসে  আছে,  তাকে  দেখালো।

ধমকের  সুরে  তাকে  ডেকে  এনে,  একজন  পুলিশ  জিজ্ঞাসা  করলেন —  ” তোমাদের  সকলকে  ডাকা  হ’ল,  তুমি  এলে  না  কেন?  কোন  বদ  উদ্দেশ্য  নেই  তো”?

“না  স্যার,  আমি  ওকে  চিনিই  না।  রিক্সাওয়ালাটা  ওকে  রিক্সায়  তুলে  নিয়ে  আসলো। আমি  পিছন  পিছন  দেখতে  এসে  আটকা  পড়েছি।  স্যার,  আমাকে  ছেড়ে  দিন।   বিশ্বাস  করুন  স্যার,  আমার  কোন  দোষ  নেই।  মা  কালীর  দিব্বি  বলছি।  কথা  দিচ্ছি স্যার,  জীবনে   আর  কোনদিন  ভুলেও  এ  কাজ  করবো  না।  কান  ধরছি  স্যার”,  বলে  লোকটি  কান  ধরে  দাঁড়ালো।

“কান  থেকে  হাত  সরাও।  কী  কাজ  করবে  না”?

“অচেনা  লোককে  রাস্তা  থেকে  হাসপাতালে  নিয়ে  আসবো  না”।

“বাজে  না  বকে  বল,  ঠিক  কী  হয়েছিল”?

“স্যার,  ছেলেটা  বাস  থেকে  নামতে  গিয়ে  পড়ে  যায়।  চলন্ত  বাসটার  পিছনের  চাকায়  চাপা   পড়ে  ও  মারা  যায়  স্যার”।

“মিথ্যে  বলবে  না, লক্-আপে  পুরে  দেব।  ও  কোথায়  মরে  গেছে?  নিজের  চোখে  দেখলাম  পুরদস্তুর  বেঁচে  আছে”।

“তা   থাকতে  পারে  স্যার,  কিন্তু  তখন   বেঁচে  ছিল  না।  মানে  তখন  আমার   তাই  মনে  হয়েছিল”।

“আপনারা  কেউ  একে  চেনেন”?

“না   স্যার”।

“তবে  এত  দরদ   দেখানো   কেন?  যত্ত  সব,  নিজেরাও  ঝামেলায়  জড়ান,  আমাদেরও  হয়রানি।  যাহোক্,  কেউ  চলে  যাবেন  না।  বাড়ির  কেউ  নেই,  ওর  কিছু  হয়ে  গেলে  আপনাদের  প্রয়োজন  হতে  পারে”।

এতক্ষণে  পুলিশ  ও  ডাক্তারদের   ছেলেটার  প্রতি  আবার  নজর  পড়লো।  প্রচুর  রক্তক্ষরণ  হয়েছে।  ব্যান্ডেজ  বাঁধা  ছাড়া,  কোন  চিকিৎসা  এখনও  শুরু  হয়  নি।  একবারে  নেতিয়ে  পড়েছে।  ক্ষীণ  স্বরে  শুধু  একবার  বললো–  “জল,  একটু  জল”।

ছেলেটাকে  ভিতরে  নিয়ে  যাওয়া  হ’ল।  বাইরে  সঙ্গী  পাঁচজন,  অজানা  আশঙ্কায়  অপেক্ষা  করতে  লাগলো।

সন্ধ্যার  দিকে  একজন  প্রৌঢ়  ও  একজন  যুবক  ট্যাক্সি  থেকে  নেমে,  প্রায়  দৌড়ে  হাসপাতালে  ঢুকলেন।  কিছুক্ষণ  আগে  ছেলেটার  জ্ঞান  ফিরে  আসলে,  তার  কাছ  থেকে পরিচয়  ও  ফোন  নম্বর  পেয়ে,  ছেলেটার  বাড়িতে  খবর  দেওয়া  হয়।  ফোন  পেয়েই  ছেলেটার  বাবা  ও  পাড়ার  এক  বন্ধু  ছুটে  এসেছেন।

পুলকেশ  বাবু  কান্না  জড়ানো  গলায়  বললেন,  “কী  বুঝছেন  ডাক্তার  বাবু?  অনিমেষ  আমার  একমাত্র  সন্তান,  ওকে  বাঁচান।  আমার  যে  আর  কেউ  নেই”।

“চেষ্টা   তো  করছি।  দেখি  কী  করতে  পারি।  ওপরওয়ালাকে  ডাকুন”।

আবার  পুলিশ  এল।  আবার  চললো  প্রশ্নোত্তরের  পালা।

ছেলে  কখন  বাড়ি  থেকে  বেড়িয়েছিল,  কোথায়  যাচ্ছিল,  সঙ্গে  কেউ  ছিল  কী  না,  কোন  রোগ  ছিল  কী  না,  এমন  কী  মৃগী   ছিল  কী  না,  তাও  জানতে  ভুললো  না।

অবশেষে  ছুটি  পেল  সঙ্গে  আসা  সঙ্গীরা।  হয়তো  মনে  মনে  প্রতিজ্ঞা  করলো–  অচেনা অজানা  তো  দুরের  কথা,  নিজের  ছেলে  বাস  চাপা  পড়লেও,  আর  সঙ্গে  আসা  নেই।

গভীর  রাত  পর্যন্ত  হাসপাতাল  চত্বরে  বসে  থেকে,  শেষ  পর্যন্ত  বাড়ি  ফিরে  এসে,  পরদিন   ভোরবেলা  আবার  হাসপাতাল।  আজও  ডাক্তাররা  তেমন   কোন  আশার  বাণী   শোনাতে  পারলেন  না।  শেষে   বেশ  রাতে  ক্লান্ত   দেহে  বাড়ি  ফিরে  আসা।

পঞ্চম  দিনে  ডাক্তাররা  জানালেন  হাতটাতে  গ্যাংগ্রীন্  ফর্ম  করে  গেছে,  কনুই  এর  একটু  ওপর  থেকে  কেটে  বাদ  দিতে  হবে।

“ডাক্তারবাবু,  জোয়ান  ছেলে,  ডান  হাত  বাদ  গেলে  ও  তো  অক্ষম  হয়ে  যাবে।  সারা  জীবন  পরে  আছে,  ও  তো  কোন  কাজ  করতে  পারবে  না,  খাবে  কী”?

“চাকরী  আগে,  না  জীবন  আগে?  ভেবে  দেখুন  কী  করবেন।  আমরা  কিন্তু  কোন  দায়িত্ব  নিতে  পারবো  না।  যদি  মনে  করেন,  অন্য  কোন  হাসপাতাল  বা  নার্সিংহোমে  নিয়ে  যেতে  পারেন,  তবে  ঝুঁকি  আপনার”।

“না  না,  আমি  সে  কথা  বলছি  না,  তবে  হাত  বাদ   দেবার  কথা  শুনে  স্থির  থাকতে  পারছি   না।  দেখুন,  যা  ভাল  বোঝেন  করবেন”।

পরদিনই  কনুই  এর  ওপর  থেকে  ডান  হাতটা   কেটে  বাদ  দেওয়া  হ’ল।  ডাক্তার   জানালেন,  আশা  করা  যায়  বিপদ  কেটে গেছে।

পুলকেশবাবু  একবার  গিয়ে  ছেলেকে  দেখে,  চোখে  জল  নিয়ে  ফিরে  আসলেন।  অনিমেষের   ছোট্ট  ডান  হাতটাতে  ব্যান্ডেজ  বাঁধা।  বহু  খোঁজাখুঁজির  পর  ডাক্তারের   দেখা   মিললো।

“ডাক্তারবাবু,  একটা  অনুরোধ  ছিল”।

“আবার  কী  অনুরোধ?  বলুন”।

“ওর  কাটা  হাতটা  যদি  ফেরৎ  দেন”।

“ঐ  কাটা  হাত  নিয়ে  আপনি  কী  করবেন”?

“ওটার  একটা  ব্যবস্থা  করা  দরকার।  না  হলে  শেয়াল  কুকুরে  কাটা  হাত  নিয়ে টানাটানি  করবে”।

“কলকাতা   শহরে   শেয়াল  পেলেন  কোথায়?  এ  ভাবে  কাটা  হাত  ফেরৎ  দেওয়া  সম্ভব  নয়,  পুলিশ  আসলে  বলবেন”।

“আবার  পুলিশ?  পুলিশ  আবার  কেন  আসবে?  ওদের  জিজ্ঞাসার  কী  এখনও  বাকী  আছে”?

“না,  তা  নয়।  তবে  লোকাল  থানা  থেকে  প্রায়  রোজই  কোন  না  কোন  পুলিশ  কেসে  ওদের  আসতেই  হয়”।

অবশেষে  পুলিশের   দেখা  মিললো।

“স্যার,  আপনাকে  একটা  অনুরোধ  করবো”?

“কী  ব্যাপার,  ছেলে  কেমন  আছে”?

“ভাল  নেই  স্যার।  হাতটা   কেটে  বাদ  দিতে  হয়েছে।  আপনি  যদি  কাটা  হাতটা  বাড়ি  নিয়ে  যাবার  অনুমতি  দেন–“।

“কাটা  হাত  বাড়ি  নিয়ে  যাবেন?  ইন্টারেষ্টিং।  কাটা  হাত  নিয়ে  কী  করবেন,  বাঁধিয়ে  রাখবেন?  যত্ত  সব্”।

“না  স্যার,  কাটা  হাতটার  একটা  গতি  করা  প্রয়োজন”।

“আরে  দাঁড়ান  মশাই।  পোষ্ট  মর্টেম  না  করে  কিছু  দেওয়া  সম্ভব  নয়”।

“স্যার,  ছেলেতো  বেঁচে  আছে।  পোষ্ট  মর্টেম  কী  ভাবে  হবে?  কাটা  হাতে  পোষ্ট  মর্টেম  হয়  বলে  তো  শুনি  নি”।

“সরি,  পোষ্ট  মর্টেম  নয়,  ইনভেষ্টিগেশন।  ছেলের  সাথে  কথা  না  বলে,  হাত  কেন,  একটা  আঙ্গুলও  ফেরৎ  পাওয়া  যাবে  না”।

“কিন্তু  ছেলে  তো  স্যার  অজ্ঞান  হয়ে  আছে।  ওর  জ্ঞান  ফিরলে  ওর  সাথে  কথা  বলবেন,  ততক্ষণে   তো  হাতটায়  পচন  ধরবে  স্যার”।

“আরে  দুর  মশাই,  কেন  বিরক্ত  করছেন?  হাতে  পচন  ধরেছে  বলেই  তো  হাতটা   কেটে  বাদ  দিতে  হয়েছে।  নতুন  করে  আর  কী  পচন  ধরবে”?

“তা  হোক,  তবু  একটা  কিছু  ব্যবস্থা  করুন  স্যার”।

“যে  জায়গায়  দুর্ঘটনাটা  ঘটেছিল,  সেই  থানায়  কথা  বলে  দেখুন।  ওরা  গ্রীন  সিগনাল  দিলে  চেষ্টা  করে  দেখবো”।

পুলকেশবাবু  ছুটলেন  দুর্ঘটনার  নিকটবর্তী  থানায়।  থানায়  গিয়ে  কথা  বলে  বুঝলেন, এই  দুর্ঘটনার  কথা  তারা  জানেই  না।  সব  শুনে  অফিসার  বললেন– “তাহলে  আমাদের  খোঁজ  করতে  হয়।  আপনাদের  ঘটনার  কথাটা  আমাদের  কাছে  আগেই  রিপোর্ট  করা উচিৎ  ছিল।  আচ্ছা,  কবে  ঘটনাটা  ঘটেছিল  বললেন”?

“আঁজ্ঞে  স্যার,  গত……….”।

কথা  শেষ  করতে  না  দিয়ে  অফিসার  বললেন,  “বলি  কেউ  সাক্ষী  আছে”?

“স্যার,  আমি  তো  ছেলের  সাথে  ছিলাম  না।  চার-পাঁচজন  লোক  সঙ্গে  করে  হাসপাতালে  নিয়ে  গিয়েছিল।  তাদের  হাসপাতালে  পুলিশ  জিজ্ঞাসাবাদ  করেছেন। আপনি  খোঁজ  করলে  ওখান  থেকে  তাদের  নাম  ঠিকানা  পেতে  পারেন”।

“ঠিক  আছে  ভেবে  দেখি  কী  করা  যায়।  কাল  একবার  আসুন”।

পুলকেশবাবু  ফিরে  এসে  পাড়ার  একজন  পলিটিকাল  লীডারের  কাছে  গিয়ে  অনুরোধ  করলেন,  কিছু  একটা  ব্যবস্থা  করার।

পরদিন  ঐ  লীডার  তাঁকে  সঙ্গে  করে  এম.এল.এ.,  সাহাবাবুর  (লাল্টুদা)  কাছে  নিয়ে গেলেন।

অনেক  অনুরোধ,  অনেক  কান্নার  পর,  সাহাবাবু  পুলকেশবাবুকে  সাহা্য্য  করার  জন্য একটা  চিঠি  লিখে  দিয়ে,  থানায়  দেখা  করতে  বললেন।

সেই  চিঠি  নিয়ে  পুলকেশবাবু  ছুটলেন  থানায়।  আগের  দিনের  অফিসারটি  সব  শুনে,  চিঠি  দেখে,  কাকে  যেন  ফোন  করে,  শেষ  পর্যন্ত  পুলকেশবাবুকে  হাসপাতালে  যেতে  বললেন।

হাসপাতালে  ডাক্তারের  দেখা  না  পেয়ে,  পুলকেশবাবু  অফিস  ঘরে  গিয়ে  একে  ওকে  জিজ্ঞাসা  করে,  শেষে  এক  ভদ্রলোককে  সব  কথা  বললেন।  এম.এল.এ.  যে  চিঠিটা দিয়েছেন,  তাও  দেখাতে  ভুললেন  না।

ভদ্রলোক  সব  শুনে,  পুলিশ  স্টেশনে  ফোনে  কথা  বলে,  শেষ  পর্যন্ত  কাগজে  সই-টই করিয়ে,  কাটা  হাত  ফেরৎ  দেবার   ব্যবস্থা  করলেন।

পুলকেশবাবুর  তখন  ছেলে  কেমন  আছে,  খোঁজ  নেবার  সময়  নেই।  কাটা  হাত  নিয়ে বাড়ি  ফিরে  এলেন।   কিন্তু  এবার  দেখা  দিল  আর  এক  সমস্যা।  কাটা  হাতটা  নিয়ে  তিনি  কী  করবেন।  শেষে  তোয়ালে  জড়িয়ে  কাটা  হাত  নিয়ে  গেলেন  স্থানীয়  শ্মশানে।  কিন্তু  অনেক  ভাবে  বুঝিয়েও,  হাতটাকে   পোড়ানোর  ব্যবস্থা  করতে  পারলেন  না।

স্যার,  একটু  অনুমতি  দিন,  কাটা  হাতটা  পোড়াবার  একটা  ব্যবস্থা  করে  দিন”।

“আরে  কাটা  হাত  কী  মৃতদেহ?  ওটা   তো  মৃতদেহের  অংশও  নয়।  কী  ভাবে  ওটা  পোড়াবার  ব্যবস্থা  করবো?  ডেথ্  সার্টিফিকেট  ছাড়া  কোন  দেহ   পোড়াতে  দেওয়া  যায়  না”।

“ডেথ  সার্টিফিকেট  কোথায়  পাব  স্যার,  ছেলে  তো  বেঁচে  আছে।  একটু  দয়া  করুন, আমি  একটা  আস্ত  মানুষ  পোড়াতে  যা  খরচ  হয়,  তাই  দেব।  বলেন  তো  দ্বিগুণ  খরচ  দেব,  একটা  ব্যবস্থা  করে  দিন  স্যার।  যদি  মনে  করেন,  অন্য  কোন  ডেডবডির  চিতায়  এটাকে  পোড়াতে  দেবার  ব্যবস্থা  করে  দিন”।

“এ  তো  মহা  আপদ।  এত  বছর  কাজ  করছি,  কোন  দিন  শুধু  হাত  পোড়াতে  কাউকে  শ্মশান  ঘাটে  আসতে  দেখিনি  মশাই”।

“স্যার,  শ্মশানের  এক  পাশে  যে  জমিতে   শিশুদের  কবর  দেওয়া  হয়,  সেখানে  এটাকে পুঁতে  দেব?  আমি  না  হয়  চা   জলখাবার  এর  জন্য  কিছু  খরচ  করবো”।

“কেন,  আপনার  ছেলে  কী  শিশু  নাকি?  কবর  যদি  দিতেই  হয়,  তো   কোন  কবরখানায়  যান”।

“স্যার,  ওরা  হিন্দুর  দেহের  অংশ,  ওখানে  কবর  দিতে  দেবে  কেন”?

“তবে  বাড়ি  নিয়ে  গিয়ে  মমি  করে  রাখুন।  কাটা  হাত  দেখে  হিন্দু-মুসলমান  চেনা  যায়,  বাপের  জন্মে  শুনি  নি।  আর  জ্বালাতন  করবেন  না  তো  মশাই,  এবার  বিদায়  হ’ন”।

অবশেষে  ক্লান্ত   দেহে  পুলকেশবাবু  বাড়ি  ফিরে  এসে,  পাশের  ছত্রিশ  বর্গফুটের  যে  জমিটা  তাঁর  আছে,  সেখানেই  এক  পাশে  হাতটাকে  পুঁতে  দিয়ে,  একটা  তুলসি  গাছ  লাগালেন।  তারপর  স্নান  সেরে  ছুটলেন  হাসপাতালে।

বেশ  কিছুদিন  পর,  অনিমেষ  ভাঙ্গা  মনে  পুলকেশবাবুর  সাথে  তার  দেহের  অংশ  যেখানে  আছে,  সেখানে  ফিরে  এল।

তুলসি  গাছটা  বেশ  তরতাজা  হয়েছে।  রোজ  সন্ধ্যায়  মা  যখন  তুলসি  তলায়  সন্ধ্যা  প্রদীপ  জ্বালান,  অনিমেষ  তখন   ভেজা   চোখে  মা’র  পাশে  দাঁড়িয়ে,  তুলসি  গাছে  জল  দেয়।  আশা,  দেবতা  নিশ্চয়  তার  বাঁহাতে  দেওয়া  জল  গ্রহণ  করবেন।  তাকে  সুস্থ  সবল  রাখবেন।  ভবিষ্যতে  সকল  বিপদ  থেকে  তাকে  রক্ষা  করবেন।

 

সুবীর  কুমার  রায়।

০১-০৩-২০০৬

 

 

 

 

 

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11 thoughts on ““হাত” {লেখাটি দাশুর ডাইরি থেকে , অন্যনিষাদ/ গল্পগুচ্ছ ও সুপ্ত প্রতিভা-Supto Protibhaপত্রিকায় প্রকাশিত।}

  1. লেখাটার সারবসতু কি,সেটা বুঝতে পারিনি। তবে এই গলপে আজকের সমাজের একটা রূপ দেখতে পেলাম। লেখাটা পড়ে ভাল লাগল।

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