“পাহাড়ের রোজনামচা” — (প্রথম পর্ব) (www.amaderchhuti.com ও Tour & Tourists পত্রিকায় ধারাবাহিক ভাবে প্রকাশিত)

DSCN9767আজ   থেকে  প্রায়  দশ  বৎসর  আগের  কথা,  কেন  জানিনা  আমার  মনে  হিমালয়,  বিশেষ  করে  গঙ্গার  উৎপত্তি  স্থান  গঙ্গোত্রী-গোমুখী,  আর  যমুনোত্রী  দেখার  ঝোঁক  চেপে  বসে।  তখন  না  ছিল  সঙ্গী,  না  ছিল  সামর্থ।  এর  কিছু  পরে  শঙ্কু  মহারাজে  বিখ্যাত  কাহিনীটি   অবলম্বনে  নির্মিত  “জাহ্নবী  যমুনা,  বিগলিত  করুণা”  সিনেমা   দেখে,  আমার  এই  ঝোঁক  যেন  আরও  বেড়ে  যায়।

এরও  বেশ  কিছুদিন  পরে,  আমার  প্রথম  হিমালয়  দর্শনের  সুযোগ  ঘটে।  অবশ্য  গঙ্গোত্রী, যমুনোত্রী  নয়। সুযোগ  আসে  নৈনিতাল,  রানীক্ষেত,  আলমোড়া,  কৌশানি,  গোয়ালদাম  ইত্যাদি  জায়গা  দেখার।  সেই  দিনগুলোর  কথা,  আজও  ভুলতে  পারিনি।  চারিদিকে  পাহাড়ের  প্রাচীর।  বহুদুরে   ত্রিশুল ,  নন্দাদেবী,  নন্দাঘুন্টি   প্রভৃতি  বরফে  ঢাকা  শৃঙ্গ,  চোখ  জুড়ানো  সূর্যদয়।  তবু মনে  হয়েছিল  আমার  কল্পনার  সাথে  যেন  মোটেই  মিল  নেই।  কোথায়  সেই  বন্ধুর  পথ?  কোথায়  চটিতে  রাত্রিবাস?   তবু  হিমালয়কে  অনেক

কাছ  থেকে  বাস্তবে  পেয়ে,  পুর্বের  ঝোঁক  যেন  আবার  নতুন  করে  প্রাণলাভ  করলো।  সময়, সুযোগ,  সঙ্গীর  অপেক্ষায়,  প্রতীক্ষা  করে  থাকলাম।

পরের  বৎসরেই  সুযোগ  এসে  গেল।  কিন্তু  সঙ্গে  বাবা-মা  থাকায়,  সে  ইচ্ছাকে  সাময়িক  ভাবে  ঘুম  পাড়িয়ে,  আমরা  দেখলাম  হরিদ্বার,  দেরাদুন,  মুসৌরী,  হৃষিকেশ।  সেটা  ছিল  সারা  দেশ  জুড়ে  বন্যা  প্লাবিত,  ১৯৭৮  সালের  নভেম্বরের  শেষ।  মুসৌরীর  লালটিব্বার  ওপর  থেকে  জাপানী  দুরবীক্ষণে,  দুরের  গঙ্গোত্রী,  যমুনোত্রী,  কেদার,  বদ্রীনারায়ণকে  কাছে  বরফ  ঢাকা  অবস্থায়  পেলাম।  তার  ওপর  আবার  হৃষিকেশে  কেদার,  বদ্রী,  গঙ্গোত্রী  ও  যমুনোত্রীগামী  বাসগুলোকে  আমাদের  ফেলে  চলে  যেতে  দেখে,  মনটা  হুহু  করে  উঠলো।  ঠিক  করলাম  আর  নয়,  সামনের  বছর  যেতেই  হবে।

আমার  প্রত্যেকবারের  ভ্রমণসঙ্গী,  মাধব  ব্যানার্জীকে  সঙ্গে  নিয়ে  দিনক্ষণ  স্থির  করে  ফেললাম।   সঙ্গী   হ’ল  আরও  একজন,  দিলীপ  পাল।  স্থির  হ’ল  প্রথমে  যাব  যমুনোত্রী,  তারপর  গঙ্গোত্রী-গোমুখী,  এরপর  কেদারনাথ,  সব  শেষে  নন্দন  কানন,  হেমকুন্ড  হয়ে  বদ্রীনারায়ণ।  সেপ্টেম্বরের  প্রথম  দিকে  যাবার  দিন  স্থির  হয়ে  গেল।  দিন  আর  কাটে  না।  ক্রমে  ক্রমে  দিনটাকে  আরও  এগিয়ে  নিয়ে  আসা  হ’ল।  স্থির  হ’ল  তেরই  আগষ্ট,  ১৯৭৯  সাল।  উত্তর  প্রদেশ  টুরিষ্ট  বিভাগ  আমাদের  পরামর্শ  দিল  প্রথমে  নন্দন  কানন  যেতে,  কারণ  আগষ্ট  মাসের  মাঝামাঝি  থেকে  নন্দন  কাননের  সমস্ত  ফুল  ঝরে  যেতে  শুরু  করবে।  কাজেই  আমাদের  পূর্ব  পরিকল্পিত  পরিকল্পনাকে  ঠিক  উল্টো করে,  আমরা  আমাদের  রাস্তা  ঠিক  করলাম। স্থানীয়  একজন  ভদ্রলোকের  কাছ  থেকে  গঙ্গোত্রী,  যমুনোত্রী  সম্বন্ধে  অনেক  প্রয়োজনীয়  ও  নতুন  তথ্য  পেলাম,  যা  উত্তর  প্রদেশ  টুরিষ্ট  বিভাগেরও  অজানা।  যাহোক্,  নির্দিষ্ট  সময়ে  আমরা  দুন  এক্সপ্রেসে  হরিদ্বারের  তিনটি  টিকিট  কাটলাম।  হান্টার  সু,  পলিথিন  সিট,  ওয়াটার  প্রুফ্,  ওয়াটার  বটল্,  ইত্যাদি  কেনাকাটাও  করে  নিলাম।  প্রস্তুত  হলাম  শুভদিনের  শুভ  ক্ষণের  জন্য।

আজ  ১৩ই  আগষ্ট,  ১৯৭৯  সাল।  আমরা  তিনজন  মালপত্র  নিয়ে  দুন  এক্সপ্রেসে  গিয়ে,  নিজেদের  আসন  দখল  করলাম ।  দিনটা  অনেকের  মতেই  শুভ  নয়।  তার  ওপর  আসবার  আগে  বেশ  এক  পশলা  বৃষ্টি  হয়ে  গেছে।  রেডিওর  খবরে  হরিদ্বারে  জলবৃদ্ধির  খবরও  অনেক  আগেই  পেয়েছি।  তাই  মনটা  অস্থির  ও খারাপ  হয়েই  ছিল। রাত  ন’টা  ত্রিশ  মিনিটে  ট্রেন  ছাড়তে,  কেন  জানিনা,  আস্তে  আস্তে  সমস্ত  দুশ্চিন্তা  মন থেকে  দুর  হয়ে  গেল।  আমরা  আমাদের  আসন্ন  যাত্রাপথ  নিয়ে  আলোচনায়  মশগুল  হয়ে  রইলাম। রাস্তায়  ট্রাভেলার্স  চেক  ভাঙ্গানো  সম্ভব  নয়।  তাই  সমস্ত  টাকা  পয়সা  নগদ  সঙ্গে  থাকায়,  আর  এক  চিন্তা।

যাহোক্,  পনেরই  আগষ্ট  সকালে  আমরা  হরিদ্বার  পৌঁছলাম।  ট্রেন  থেকে  প্রচন্ড  বৃষ্টির  মধ্যে   নেমে  দেখলাম,  চারিদিক  ঘন  কালো  মেঘে  অন্ধকার  হয়ে  আছে। আমাদের  সঙ্গে  ছোট  তিনটে  হোল্ড্-অল্,  ও  তিনটে  ছোট  সুটকেস্।  মাঝপথে  কেউ  ফিরে  আসতে  চাইলে,  সে  একাই  ফিরে  আসবে,  তাই  এই  ব্যবস্থা।  নিজেরা  যে  যার  মাল  নিয়ে  স্টেশনের  বাইরে  এলাম।  বাসস্ট্যান্ড  কিছুটা  দুরে,  তাই  শেয়ার  ট্যাক্সিতে জায়গা  করে  নিলাম।  বৃষ্টিতে  ট্যাক্সির  কাচ  ঝাপসা  হয়ে  যাচ্ছে।  রাস্তার  চারিদিকে  বড়  বড়  গর্ত  হয়ে  আছে।  গঙ্গার  ধারে,  রাস্তার  পাশে,  একটা  অয়েল  ট্যাঙ্কার  কাত  হয়ে   রাস্তা  প্রায়  বন্ধ  করে  রেখেছে।  দুরের  পাহাড়  ঘন  মেঘে  কালো  হয়ে  আছে।  সব  কিছু  মিলে  গোটা  পরিবেশটাই  একটা  ভয়াবহ  আকার  ধারণ  করে  আছে।  বুঝতে  পারছি  আমাদের  কপালে  দুঃখ  আছে।  অল্প  কিছুক্ষণ  পরেই  আমাদের  ট্যাক্সি  কালীকম্বলী  ধর্মশালার  কাছে  আমাদের  ছেড়ে  দিল।  আমরা  একুশ  টাকা  ভাড়া  মিটিয়ে  দিয়ে,  গুটিগুটি  পায়ে  বৃষ্টিতে  ভিজে  ধর্মশালায়  পৌঁছলাম।  ধর্মশালার  নতুন  বাড়িটা  বেশ  ভাল।  সব  রকম  সুযোগ  সুবিধা  আছে।   কিন্তু  কী  কারণে  জানিনা,  কর্তৃপক্ষ  আমাদের  নতুন  বাড়িতে  স্থান  দিতে  সম্মত  হ’ল  না।  তাই  স্থানীয়  একজনের  বাড়িতে  আঠারো  টাকা  ভাড়া  দিয়ে,  একখানা  ঘর  ঠিক  করলাম।  ভদ্রলোক  আমাদের  বাঙালীবাবু  বলে  সম্বোধন  করে  বললেন,  “আপনারা  ডিম  খাবেন?  আমার  কাছে  ডিম  পাবেন”।  আমরা  আশ্চর্ষ  হয়ে  গেলাম।

যাহোক্,  আমরা  বাইরে  কিছু  চা-জলখাবার  খেয়ে  নিয়ে  ঘরে  ফিরে  এলাম।  ভদ্রলোক আবার  জিজ্ঞাসা  করলেন  আমাদের  কিছু  প্রয়োজন  আছে  কী  না,  আমরা  কিছু  খাব কী  না।  আমরা  তাকে  জানালাম,  আমরা   খেয়ে  এসেছি,  এবং  এখন  তাকে  আমাদের  কোন  প্রয়োজন  নেই।  ভদ্রলোক  তবু  বললেন,  “এ  বাড়ি  আপনাদেরই  নিজস্ব  বাড়ি  বলে  মনে  করবেন।  কোন  রকম  অসুবিধা  হলেই,  আমাকে  জানাবেন”।  আমরা  কোনমতে  তাকে  তখনকার  মতো  বিদায়  করে,  দরজা  বন্ধ  করলাম।  একটু  পরে  আমরা  বাসস্ট্যান্ডে  গিয়ে  জানতে  পারলাম  যে,  বেলা  দু’টোয়  বদ্রীনারায়ণগামী  বাস  ছাড়বে  এবং  ঐ  বাস  সন্ধ্যায়  শ্রীনগরে  হল্ট্  করবে।  সঙ্গে  সঙ্গে  বাসায়  ফিরে  এলাম।  দরজা  বন্ধ  করে  যত  তাড়াতাড়ি  সম্ভব  মালপত্র  গোছগাছ  করতে  লেগে  গেলাম।  প্রত্যেকটা  হোল্ড-অল্  এর  ভিতরে  কম্বলগুলো  পলিথিন  সীট  দিয়ে  মুড়ে  নিলাম।  হোল্ড্-অলটাও  একটা  পলিথিন  কভারে  পুরে  ফেললাম।  বৃষ্টিতে  কম্বল  ভিজবার  আর  কোন  সম্ভাবনাই  থাকলো  না।  সব  সময়  প্রয়োজন  হতে  পারে,  এমন  সমস্ত  জিনিস,  সামান্য  করে  শুকনো  খাবার,  চিকলেটস্,  ইত্যাদি  একটা  সুটকেসে  নিয়ে,  সমস্ত  জিনিস  অপর  সুটকেস  দু’টোয়  ভরে  নিলাম।  টাকার  হিসাব  করতে  গিয়ে  আমরা  মহা  বিপদে  পড়লাম।  একটা  পাঁচ  টাকার  প্যাকেট,  অর্থাৎ  পাঁচশ’  টাকা, কোথাও  খুঁজে  পেলাম  না।  আবার  সমস্ত  সুটকেস  ঘেঁটে,  শেষ  পর্যন্ত  একটা  ওয়াটার প্রুফের  ভিতরে  সেটাকে  পাওয়া  গেল।  চটপট্  ভাল  করে  সাবান  মেখে  তিনজনে  স্নান  করে  নিলাম।  জানিনা  কবে  আবার  এ  সুযোগ  পাব।  সব  কিছু  কাজ  শেষ।  মালপত্র  ঘরেই  রেখে,  দুপুরের  খাবার  খেতে  গেলাম।  কিছুক্ষণ  আগেই  চা-জলখাবার  খাওয়ায়  খিদে  নেই,  তবু  সামান্য  কিছু  ভাত,  ডাল,  তরকারী,  একটা  পাঞ্জাবি  হোটেলে  খেয়ে  নিলাম।  মনে  মনে  স্থির  করলাম,  এরপর   থেকে  সব  জায়গায়  রুটি  খাব।  কারণ  ভাত  খেলে  ঘুম  পায়  এবং  হাঁটতে  কষ্ট  হয়।

খাওয়া  হলে  গেলাম  বাসের  টিকিট  কাউন্টারে।  আমাদের  সামনে  একজন  পাঞ্জাবি  সাধু,  পাঁচটা  গোবিন্দঘাটের  টিকিট  কাটলেন।  আমাদেরও  ওখানকারই  টিকিট  প্রয়োজন।  গোবিন্দঘাট  থেকেই  নন্দন  কানন  ও  হেমকুন্ড  যাবার  হাঁটা  পথের  শুরু।  মোটামুটি  খোঁজখবর  নিয়ে,  আমরা  তিনটে  গোবিন্দঘাটের  টিকিট  কাটলাম।  ভাড়া  লাগলো  পঁচাশি  টাকা  পঞ্চাশ  পয়সা।  সামনের  রাস্তা  আমাদের  সকলেরই  অজানা। গাইড  ম্যাপ  ও  কিছু  লোকের  মুখের  কথার  ওপর,  আমাদের  সমস্ত  টুরটার  ভবিষ্যৎ  নির্ভর  করছে।  নিজেদেরও  এই  জাতীয়  ভ্রমণ,  এই  প্রথম।  তাই  বোধহয়  আমরা  একটু  অস্বাচ্ছন্দ  ও  অস্বস্তি   বোধ  করতে  লাগলাম।  ঘরে  ফিরে  এসে  সমস্ত  মালপত্র  নিয়ে  বাসের  উদ্দেশ্যে  যাত্রা  করার  আগে  আমাদের  বাড়িওয়ালা  ভদ্রলোককে  বললাম, “বাসের  টিকিট  পেয়ে  গেলাম,  তাই  আর  অপেক্ষা  না  করে  আমরা  চলে  যাচ্ছি।  আপনি  যদি  ভাড়ার  ব্যাপারটা  একটু  কনসিডার  করেন,  তাহলে  খুব  উপকার  হয়”।  যে  ভদ্রলোক  কিছুক্ষণ  আগেও  আমাদের  বলেছিলেন,  এ  বাড়িটা  নাকি  আমাদেরই,  তিনিই  এখন  বললেন  এটাতো হোটেল,  তাই  একঘন্টা   বা  একদিনের  একই  ভাড়া।  বললাম  আমাদের  জোর  করার  কিছু  নেই,  তবে  আমরা   আবার  হৃষিকেশেই  ফিরে  আসবো  এবং  কয়েকদিন  এখানে  থেকে  বিশ্রাম  নেব।  তবু  কোন  লাভ  হ’ল  না,  পুরো  ভাড়াই  দিতে  হ’ল।

দিলীপকে  বাসে  চাপিয়ে,  সামনের  দিকে  দু’টো  সিট  রেখে,  মালপত্র  সব  বাসের  ছাদে  তুলে,  আমি  ও  মাধব  গেলাম  পয়েন্টেড  লাঠি  কিনতে।  ওটা  সঙ্গে  থাকলে  হাঁটার  কষ্ট  অনেক  কম  হবে।  তিনটে  ভাল  লাঠি  ছ’টাকা  দিয়ে  কিনে,  আমরা  বাসে  ফিরে  এসে  জায়গা  দখল  করে  বসলাম।  আরও  আধঘন্টা  পরে  বাস  ছাড়ার  কথা।  সময়  আর  কাটে  না।  আমাদের  সামনে  দু’টো  করে  দু’দিকে  সিট  আছে।  সেগুলো সমস্ত  পাঞ্জাবী  ভদ্রলোক  ও   ভদ্রমহিলা  দ্বারা  অধিকৃত।  একবারে  সামনে,  ড্রাইভারের  বাঁপাশে  একটা  সিঙ্গল্  সিটে,  সেই  পাঞ্জাবি  সাধুবাবা  বসে  আছেন।  বাকি  সমস্ত  পাঞ্জাবিরা  তাঁকে  খুব  সম্মান  দেখাচ্ছেন,  তাঁর  সুবিধা  অসুবিধার  দিকে  লক্ষ্য  রাখছেন।  আমাদের  ঠিক  পিছনেই  মধ্যপ্রদেশ  থেকে  আগত  একটা  দল,  যাবে  বদ্রীনারায়ণ।  এদের  সব  ভাল,  কিন্তু  এরা  বড়  নোংরা।  অনবরত  এদের  থুথু  ফেলতে  হয়।  থুথু  ফেলার  বহর  দেখে  মনে  হয়,  প্রত্যেকে  তার  দেহের  ওজনের  থেকে  বেশি  থুথু  সারাদিনে  ফেলে।  পিছনে  ডানদিকে  উত্তরপ্রদেশের  কয়েকজন  আছে।  বাদবাকির  খবর  জানতে  পারলাম  না।  এখনও  ড্রাইভার  বাসে  আসে  নি।  বাস  থেকে  নেমে  কিছুটা  হেঁটে,  নিজেদের  মন  ও  শরীরকে  একটু  চাঙ্গা  করে  নিলাম।  উত্তেজনায়  বারবার  জল  পিপাসা  পাচ্ছে।  বাসে  ফিরে  এসে  জানালার  ধারে  বসে  রইলাম।

পৌনে  দু’টো  নাগাদ  ড্রাইভার  বাসে  এসে  বসলো।  টিকিট  নিয়ে  কয়েকজনের  সঙ্গে  কন্ডাক্টারের  বিতর্ক  শুরু  হ’ল।  এত  বিরক্ত  লাগছে  কী  বলবো।  যাহোক্,  অনেক  দিনের  স্বপ্নকে  বাস্তবে  রূপ  দিতে,  বাস  ছেড়ে  দিল।  সেই  মুহুর্তের  কথা  ঠিক  বোঝাতে  পারবো  না।  ক্রমে  লছমনঝোলা  পুলকে  ডানপাশে  রেখে,  বাস  এগিয়ে  চললো।  অনেকেই  জোর  গলায়  ভগবানের  নাম  করতে  লাগলো।  প্রতি  মুহুর্তে  নতুন  নতুন  দৃশ্যকে  পিছনে   ফেলে,  বাস  গন্তব্য  পথের  দিকে  এগিয়ে  চললো।  আমার  পাশে  মাধব,  অপরদিকে  জানালার  ধারে  দিলীপ।  যত  ভাল  ভাল  দৃশ্য ,  সব  যেন  ওর  দিকেই  রয়েছে।  ওর  পাশে  একজন  স্থানীয়  ভদ্রলোক।  তিনি  এই  পথের  নানা  জায়গা  সম্বন্ধে  দিলীপকে  নানা  কথা  বলছেন।

একসময়  আমরা  দেবপ্রয়াগ  এসে  পৌঁছলাম।  খুব  সুন্দর  জায়গা।  সন্ধ্যা  নাগাদ  আমরা  গাড়োয়ালের  রাজধানী,  পাহাড়ী  শহর   শ্রীনগর  এসে  পৌঁছলাম।  চটপট  বাসের  ছাদ  থেকে  মালপত্র  নামিয়ে,  সামনেই একটা  ছোট  হোটেলে  রাতে  থাকবার  কথা  বলতে,  হোটেল  মালিক  এক  অদ্ভুত  প্রস্তাব  দিলেন।  তিনি  ঘরের  ভিতরে  মালপত্র  রেখে,  আমাদের  রাস্তার  পাশে  বারান্দায়,  খাটিয়ায়  শোবার  ব্যবস্থা  করতে  বললেন।  এটা  মোটেই  স্বাস্থ্যকর  প্রস্তাব  বলে  মনে  হ’ল  না।  কী  করবো  ভাবছি।  সমস্ত  পাঞ্জাবীরা  চলে গেছেন  সামনের  গুরুদ্বোয়ারায়।  হঠাৎ  একজন  ভদ্রলোক  আমাদের  জিজ্ঞাসা  করলেন  আমরা  বাঙালি  কিনা।  ভদ্রলোক  স্থানীয়,  কেদারনাথের  পথে  ট্র্যান্সপোর্টে  কাজ  করেন।  আমরা  জানালাম  আমরা  বাঙালি, হাওড়ায়  থাকি।  ভদ্রলোক  বললেন  তিনি  কালীকম্বলী  ধর্মশালায়  আজ  রাতটা  থাকবেন,  আমরা  ইচ্ছে  করলে  ওখানেই  থাকতে  পারি।  এবার  ভদ্রলোককে  চিনতে  পারলাম।  উনি  আমাদের  সাথে  একই  বাসে  এসেছেন,  যাবেন  শ্রীনগর  ছেড়ে  আরও  কিছুটা  দুরে।  আমরা  তাঁর  সাথে  যেতে  রাজী  হয়ে  গেলাম।  ধর্মশালায়  আমাদের  তিনজনকে  প্রথমে  থাকতে  দিতে  সম্মত  হ’ল  না।  ভদ্রলোককে  একটা  ঘর  অবশ্য  দিয়ে  দিল।  শেষে  ঐ  ভদ্রলোকের  অনুরোধে,  আমাদেরও  একটা  ঘর  ধর্মশালা  কর্তৃপক্ষ  দিতে  রাজী  হ’ল।  ভদ্রলোককে  ধন্যবাদ  জানাতে  তিনি  বললেন,  তিনি  বাঙালিদের  খুব  পছন্দ  করেন,  সাহায্য  করতে  চেষ্টা  করেন,  কারণ  একসময়  তিনি  মাস  ছয়-সাতেক  কলকাতায়   ছিলেন।  কলকাতায়  তাঁর  তিক্ত  অভিজ্ঞতার  কথা  শুনে,  নিজেদের  খুব  ছোট  মনে  হ’ল।  তাঁর  আন্তরিকতা  থেকে  বুঝলাম,  ভদ্রলোক  বাজে  কথা  বলছেন  না।  আমরা  বললাম  যে  তাঁর  ভাগ্য  খারাপ  ছিল,  তাই  তিনি  খারাপ  লোকের  পাল্লায়  পড়েছিলেন।  যদিও  জানি  “ঠগ  বাছতে  গাঁ  উজড়”  এর  মতো,  এই  শ্রেণীর  যুবক  বাছতে  শহর  উজার  হয়ে  যাবে।  যাহোক্,  ভদ্রলোক  সবসময়  আমাদের  সাথেই  থাকলেন  এবং  সঙ্গে  করে  সমস্ত  শ্রীনগর  শহর  ঘুরে  দেখালেন।  সন্ধ্যার  শ্রীনগর  বড়  সুন্দর।  আজ  আবার  স্বাধীনতা  দিবস।  অনেক  জায়গা  নানাভাবে  সাজানো  হয়েছে।  আলাপ  হ’ল  এক  মিলিটারি  ভদ্রলোকের  সাথে।  রাতে  আমরা  পাঁচজন  একসাথে  একটা  হোটেলে  আহার  করলাম।   দাম  অবশ্য  আমরাই  দিলাম।  ভদ্রলোক  রাতে  ঘুমতে  যাবার  আগে  আমাদের  ঠিকানা  নিলেন,  নিজের  ঠিকানাও  দিলেন।  আমরা   হোল্ড-অল্  খুলে  শুয়ে  পড়লাম।

আজ  ষোলই  আগষ্ট।  ভোরবেলা  তৈরী  হয়ে  মালপত্র  নিয়ে  বাসে  গেলাম।  বাসের  ছাদে  মালপত্র  সাজিয়ে  রেখে  এসে  নিজের  সিটে  বসতে,  পাঞ্জাবি  সাধুবাবা  আমায়  জিজ্ঞাসা  করলেন,  আমরা  গতকাল  কেন  তাঁদের  সাথে  গুরুদ্বোয়ারাতে  উঠলাম  না?  বিড়ি-সিগারেট  খাওয়ার  অসুবিধার  জন্যই  কী?  গুরুদ্বোয়ারায়  ধুমপান  নিষেধ।  আমি  কী  উত্তর  দেব  ভেবে  না  পেয়ে  বললাম  যে,  তাঁদের  সঙ্গে  অনেক  লোক,  গুরুদ্বোয়ারায়  হয়তো  জায়গা  হবে  না।  তাই  আমরা  ওখানে  না  গিয়ে,  অন্যত্র  উঠেছিলাম।  অন্য  কোন  অসুবিধার  কথা  ভেবে  নয়।  সাধুবাবা  বললেন,  যত  লোকই  আসুক,  গুরুদ্বোয়ারায়  জায়গা  হবেই,  খাওয়ার  ব্যবস্থাও  হবে।  আমাদের  ধারণা  ভ্রান্ত।  বললাম  এরপর  থেকে  তাঁদের  সঙ্গে  গুরুদ্বোয়ারাতেই  থাকবো।  বলবার  একমাত্র  কারণ,  গোবিন্দঘাটে  একটা   গুরুদ্বোয়ারা  ছাড়া,  কোন  হোটেল  বা   থাকবার  জায়গা   নেই।  এঁরা  অসন্তুষ্ট  হলে  যদি  সেখানে  স্থান  না  পাই?  বাধ্য  হয়ে  আমরাও  তাঁকে  একটু  আলাদা  সম্মান  দেখিয়ে  কথা  বলতে  শুরু  করলাম।

বাস  আস্তে  আস্তে  একসময়  রুদ্রপ্রয়াগ  এসে  পৌঁছল।  আমরা  বাস  থেকে  নেমে,  চা-জলখাবার  খেয়ে  নিয়ে, জায়গাটা  এক  চক্করে  দেখে  নিলাম।  জায়গাটা  খুব  সুন্দর,  অলকানন্দা  ও  মন্দাকিনী  নদী  এখানে  মিশেছে।  তবে  একটা  কথা  বারবার  মনে  হচ্ছিল।  জিম  করবেট্  এর  “রুদ্রপ্রয়াগের  চিতা”  পড়েছি।  কত  বছর  আগেকার  ঘটনা।  জায়গাটা  এখনই  এই,  তাহলে  তখন  কী  ছিল?  করবেট  সাহেব  কিভাবে  ঐ  রকম  একটা  হিংস্র  চিতাকে  এখানে  মেরেছিলেন,  ভাবতেও  অবাক  লাগে।  মনে  হয়,  হয়  চিতাটা  স্বেচ্ছায়  তাঁর  হাতে  প্রাণ  দিয়েছিল,  না  হয়  করবেট  সাহেব  “অমনিপ্রেজেন্ট্”  ছিলেন।

কমে  গৌচর,  কর্ণপ্রয়াগ,  নন্দপ্রয়াগ  অতিক্রম  করে  আমাদের  বাস  এগিয়ে  চললো।  ড্রাইভারের  হাত  খুব  ভাল,  তবে  বড়  ওভারটেক  করার  নেশা।  বাস  চামোলী  নামে  একটা  জায়গায়  এসে  দাঁড়িয়ে  গেল।  সামনে  ধ্বস  নেমেছে।  একটা  বুলডোজার  দেখলাম  রাস্তা  পরিস্কারের  জন্য  প্রস্তুত।  কিছুক্ষণের  মধ্যেই  রাস্তা  পরিস্কার  হয়ে  যাওয়ায়,  বাস  আবার  ছাড়লো।  কন্ডাক্টারের  কাছে  জানতে  পারলাম  সামনেই  পিপলকোঠি,  ওখানেই  দুপুরের  খাবারের  ব্যবস্থা  করে  নিতে  হবে।  ঠিক  সময়  বাস  এসে  নির্দিষ্ট  জায়গায় দাঁড়ালে,  আমরা  তিনজন  চটপট্  বাস  থেকে  নেমে,  সামনেই  একটা   ছোট্ট   হোটেলে  রুটি  তরকারীর  অর্ডার  দিলাম।  একটু  পরেই  আমাদের  বাসের  পাঞ্জাবিরা  এসে  ঐ  হোটেলে  জায়গা  করে  নিল।  একসাথে অত  খদ্দের  পেয়ে,  দোকানদার  তাদের  আগে  খাবার  পরিবেশন  করা  নিয়ে  ব্যস্ত  হয়ে  পড়লো।  আমরা  বসেই  আছি।  শেষে  রাগ  করে  উঠে  গিয়ে  একটু  দুরেই  অন্য  একটা   ছোট   হোটেলে  রুটি,  সবজী  আর  টক  দই  খেয়ে  নিয়ে  বাসে  ফিরে  এলাম।  একটু  পরেই  বাস  ছেড়ে  দিল।  কিন্তু  সামান্য  এগিয়েই  বাস  থেমে  গেল।  বুঝলাম  আবার  পাহাড়  নেমে  এসেছে।  দেখলাম  দশ-বার  বৎসরের  কয়েকটা  বাচ্চা  ছেলে,  রাস্তা  পরিস্কার  করছে।  ভাবলাম  এত  বাচ্চাদের  দিয়ে  কাজ  হচ্ছে,  আর  হয়তো  আজ  এগিয়ে যাওয়া  যাবে  না।  কিন্তু  আশ্চর্য,  অল্পক্ষণের  মধ্যেই  ওরা  ওদের  ক্ষমতার  পরিচয়  দিল।  বাস  আবার  এগিয়ে  চললো।

কিন্তু হায় !  আমাদের  কপাল  সত্যিই  খুব  খারাপ।  দুর  থেকে  দেখলাম  লাইন  দিয়ে  বাস,  জীপ,  ট্রাক  দাঁড়িয়ে।  আমাদের  বাস  অনেকগুলো  গাড়িকে  কাটিয়ে,  একবারে  সামনের  দিকে  গিয়ে  দাঁড়ালো।  শুনলাম সামনে  এমন  ধ্বস  নেমেছে,  যে  হেঁটেও  যাওয়া  সম্ভব  নয়।  ঘড়িতে  এখন  দুপুর  দু’টো  বাজে।  ধ্বসটা  একটা  বাঁক  পেরিয়েই  দেখতে  পেলাম।  ওপর  থেকে  বিরাট  বড়  বড়  পাথর  রাস্তার  ওপর  পড়ে,  রাস্তাকে  নিয়ে  তলায়  চলে  গেছে।  একজন  পাঞ্জাবি  মিলিটারির  তত্বাবধানে  বেশ  কিছু  আগের  মতো  বাচ্চা,  রাস্তা পরিস্কারের  কাজ  করছে।  ধ্বসটার  অপর  দিকে  হেলং  নামে  একটা  শহর।  ধ্বসের  ওপারে  কতগুলো  বাস  দাঁড়িয়ে  আছে  জানিনা,  তবে  আমাদের  এদিকে  বাস,  জীপ  ও  ট্রাক  মিলে  প্রায়  চল্লিশটা  গাড়ি  লাইন  দিয়ে  দাঁড়িয়ে  আছে।  আমাদের  বাসের  আমরা  তিনজন  ও  কয়েকজন  পাঞ্জাবি  ভদ্রলোক,  ঐ  মিলিটারিটাকে  জিজ্ঞাসা  করলাম,  আমরা  কাজে  হাত  লাগাবো  কিনা।  কিন্তু  কেন  জানিনা,  আমাদের  কোন  কাজে  হাত  লাগাতে  দেওয়া  হ’ল  না।

HELANG   HELANG (2)

     ধ্বসের কবলে হেলং                         হেলং

আসবার  পথে  অনেক  ঝরনা  দেখেছিলাম।  ভাবলাম  এই  ফাঁকে  আমাদের  তিনটে  ওয়াটার  বটল্  ভরে  নিয়ে  আসি।  কিন্তু  এখানে  দেখলাম  কাছেপিঠে  কোন  ঝরনা  নেই।  অনেক  লোক  বালতি,  হাঁড়ি,  ডেকচি  নিয়ে  ইতস্তত  ঘুরে  বেড়াচ্ছে।  উদ্দেশ্য  একই,  খাবার  জল  সংগ্রহ  একান্ত  প্রয়োজন।  বেশ  কিছুটা  এগিয়ে  দেখলাম,  একটা  পাথর  জলে  ভিজে  রয়েছে।  খুব  সরু  একটা  জলের  ধারা  ঐ  পাথরটার   ওপর  দিয়ে  গড়িয়ে  রাস্তায়  পড়ছে।  একজন  পাথরটার  ওপর  একটা  গাছের  পাতা   এমন  ভাবে  পেতে  দিল,  যে  ঐ  সরু  জলধারা  পাথরের  ওপর  দিয়ে  গড়িয়ে  না  পড়ে,  পাতার  ডগা  দিয়ে  টপটপ্  করে  পড়তে  শুরু  করলো।  সেই  পাতা  থেকে  নিজেদের  বালতি,  হাঁড়ি  ভরে  নেবার  জন্য  অনেক  লোকের  ভিড়।  আমি  এগিয়ে  গিয়ে  আমার  দামী  ভাঙ্গা  ভাঙ্গা  হিন্দীতে  ওদের  বললাম,  “এত  লোক,  আর  এই  সামান্য  জল।  প্রত্যেকে  অল্প  অল্প  করে  জল  নাও”।  ওদের  সকলের  মধ্যে  আমার  জামাকাপড়  একটু  পরিস্কার  পরিচ্ছন্ন  বলে,  ও  চেহারা,  চালচলন  একটু  শহুরে  বলেই  বোধহয়,  ওরা  আমাকে  আগে  জল  নিতে  দিল।  প্রথমে  ভেবেছিলাম  আধ  ওয়াটার  বটল্  জল  ভরে  নেব।  কিন্তু  বিকেল  হয়ে  আসছে,  বাস  আজ  আর  ছাড়বার  আশা  খুবই  কম।  সঙ্গে  খাবার  বলতে  এক  শুকনো  চিড়ে  আছে।  ফলে  জল  অনেক  বেশি  প্রয়োজন।  আমার  ওয়াটার  বটল্  ভর্তি  হয়ে  গেলে,  দিলীপকে  ওর  বটলটা  ভরার  জন্য  দাঁড়  করিয়ে  দিলাম।  ইতিমধ্যে  মাধবও  তার  বটল্  নিয়ে  এসে  হাজির।  তিনজনের  বটলই  একরকম  দেখতে,  ফলে  ওরা  বুঝতে  পারবে  আমরা  একই  দলের   লোক।  তবু  মাধবকে  খুব  আস্তে  বললাম,  কোন  কথা  না  বলে  চুপচাপ  জল  ভরে  নিতে।

তিনজনের  ওয়াটার  বটল্  জলে  ভর্তি,  সঙ্গে  যথেষ্ট  চিড়ে  আছে।  কাজেই  চিন্তা  অনেক  কমে  গেল। চারিদিকে  খাবার  জলের  জন্য  হাহাকার।  বন্ধুদের  বললাম,  যে  যার  বটল্  নিজের  কাছে  রাখতে।  বাসে  রেখে  গেলে  অন্য  লোকে  এগুলো  ফাঁকা  করে  দেবার  সম্ভাবনা  যথেষ্ট।  ধীরে  ধীরে  সন্ধ্যা  নেমে  আসছে। অনবরত  ডিনামাইট  দিয়ে  পাথর   ভেঙ্গে  রাস্তা  পরিস্কারের  কাজ  চলছে।  অজানা  ভবিষ্যৎকে  প্রকৃতির  হাতে  ছেড়ে  দিয়ে,  একবার  বাস  একবার  ধ্বস  করে  বেড়াচ্ছি।  সমস্ত   টাকা  পয়সা  বাসের  সিটে, সুটকেসে  রাখা  আছে।  ওয়াটার  বটলগুলো  আর  বয়ে  বেড়াতে  ভালো  লাগছে  না।  তাই  ওগুলোকে  বাসেই  রেখে   এলাম।  রাস্তায়  এক  বৃদ্ধ  ভদ্রলোকের  সাথে  আলাপ  হ’ল।  তিনি  কেদারনাথ  থেকে  বদ্রীনারায়ণ  চলেছেন।  কোন  একটা  বাসে  তাঁর  বৃদ্ধা  স্ত্রী  রয়েছেন।  ভদ্রলোক  বললেন  সারাদিন  তাঁদের  কিছুই  খাওয়া  হয়  নি।  একটু  খাবার  জলের  জন্য  ভদ্রলোক   খুব  ব্যস্ত।  গলার  স্বর  কাঁপছে।  শুনে  খুব  খারাপ  লাগছিল,  কিন্তু  প্রাণে  ধরে  একটু  জলও  তাঁকে  দিতে  পারলাম  না।

এরমধ্যে  ঠিক  হ’ল,  এদিকের  যাত্রীদের  ওদিকের  বাস  নিয়ে  যাবে,  ওদিকের  যাত্রীদের  এদিকের  বাস।  একটা  আশার  আলো  দেখা  গেল।  কিন্তু  সমস্যা  হ’ল,  এই  রাস্তায়  তিন-চার  রকম  কোম্পানীর  বাস  চলে।  একই  কোম্পানীর  বাস  দু’দিকে  থাকলে,  তবেই  এ  ব্যবস্থা  করা  যেতে  পারে।  আমরা  এ  সুযোগ পেলাম  না।  বেশ  কিছু  যাত্রী  মালপত্র  নিয়ে  এপার-ওপার  করতে  আরম্ভ  করে  দিল।  ফলে  রাস্তা  পরিস্কারের  কাজে  বিলম্ব  হতে  শুরু  করলো।  শেষে  মিলিটারি  ভদ্রলোক  ঘোষণা  করলেন,  আজ  আর  কাজ  করা  সম্ভব  নয়।  আগামী  কাল  সকালে  আবার  কাজ  আরম্ভ  হবে।  আকাশও  কালো  মেঘে  ঢেকে  গেছে।  আমরা  বুঝতে  পারছি  এভাবে  চললে  খুব  বেশী  হলে  নন্দনকানন,  হেমকুন্ড  সাহেব,  কেদারনাথ,  ও বদ্রীনারায়ণ  যাওয়া  হবে।  গঙ্গোত্রী,  গোমুখ,  যমুনোত্রী  যাবার  সম্ভাবনা  খুব  কম।  মনটা  খারাপ  হয়ে  গেল।  বাসে  ফিরে  এলাম।  আসবার  সময়  দেখলাম  মহিলারা  রাস্তার  ওপর  স্টোভ  জ্বেলে  লুচি,  সুজি  তৈরী  করতে  শুরু  করে  দিয়েছে।  বাস  ড্রাইভার  বাসের  যাত্রীদের  বললো,  পিছনে  তিন  কিলোমিটার  দুরে  “লংসী”  নামে  একটা  গ্রাম  পাওয়া  যাবে।  ওখানে  গেলে  রাতে  থাকার  ও  খাবার  ব্যবস্থা  করা  যাবে।  এ রাস্তায়  রাতে  বাসে  থাকার  নিয়ম  নেই,  উচিৎও  নয়।  খবরটা শুনে  বাসের  সব  যাত্রীই  খুব  খুশি  হ’ল।

বাসটাকে ঘুরিয়ে নিয়ে কথামতো লংসী গ্রামে আসা হ’ল। রাস্তায় দু’টো বড় ও একটা ছোট ঝরনা দেখলাম। গ্রাম মানে  দু’টো   ছোট  চায়ের  দোকান।  অন্ধকারে  বোঝা  যাচ্ছে  না,  হয়তো  কিছু  জনবসতি থাকতেও  পারে।  একটা  দোকানে  চা  আর  পকোড়া খেয়ে  নিলাম।  আজ  বুঝলাম  খিদে  পেলে  ঠান্ডা  ন্যাতনেতে  পকোড়াও  কত  উপাদেও  হয়।  যাহোক্,  পনের  টাকা  ভাড়ায়,  একটা  মাত্র  ঘর  পাওয়া  গেল। সে  ঘরে  দাঁড়িয়ে  থাকলেও,  বাসের  অর্ধেক  লোকের  জায়গা  হবে  না।  ফলে  সে  ঘরে  কেউই  থাকতে  রাজী হ’ল  না।  ঠিক  হ’ল  সবাই  রাস্তায়  ও  বাসেই  রাতটা  কাটিয়ে   দেবে।  বুঝতে  পারছি  বিপদে  পড়ে  আমরা  কখন   যেন  একই  পরিবারের  সদস্য  হয়ে  উঠেছি।

আমরা  তিনজন  আবার  হেলং  এর  দিকে  হাঁটতে  শুরু  করলাম।  আসার  পথে  ওদিকে  ঝরনা  দেখে  এসেছি।  কাল  সকালে  সূর্যালোকে  এখানে  সকালের  কাজ  সারতে  অসুবিধা  হতে  পারে,  কাজেই  এই  সময়  কাজটা  সেরে  ফেলার  চেষ্টা  করে  দেখা  যেতে  পারে।  ঝরণার  আশায়  প্রায় দেড়-দুই  কিলোমিটার  পথ  হেঁটে  এসেও,  ঝরনাগুলো  দেখতে  পেলাম  না।  এই  অন্ধকারে  আর  এগিয়ে  যেতেও  সাহস  হ’ল  না।  রাস্তার  ধার  দিয়ে  নালার  মতো  জল  যাচ্ছে।  বোধহয়  আমাদের  দেখা  ঝরনারই  জল।  রাস্তার  ধারে  তিনজন  লাইন  দিয়ে  বসে  পড়লাম।  পাশ  দিয়ে  গোটা  দু’তিন  মিলিটারি  জীপ  ফিরে  গেল।  আমরা  কাজ সেরে  বাসের  কাছে  ফিরে  এসে  দেখি,  তিনজন  পাঞ্জাবি  ভদ্রমহিলা  ও  একজন  পাঞ্জাবি  ভদ্রলোক,  বাসের  পাশে  বড়  একটা  পলিথিন  সিট   পেতে  শুয়ে  আছেন।  ঐ  পরিবারের   আর  একজন  ভদ্রলোকের  সাথে  আলাপ  হ’ল,  নাম  তীরথ  সিং।  স্টেট  ব্যাঙ্ক  অফ্  পাতিয়ালায়  কাজ  করে,  পাতিয়ালাতেই  থাকে।  তার  কথাবার্তায়  বুঝলাম,  ভদ্রলোকের  অগাধ  পয়সা।  সে  জানালো  তার  সঙ্গে  তার  মা,  বোন,  ও  ভগ্নীপতি  আছে।  যাবে  হেমকুন্ড  সাহেব।  আমরা  জানালাম  আমরাও  হেমকুন্ড  যাব,  নন্দনকাননও  যাব।  তীরথ  জানালো  তার  খুব  নন্দনকানন   দেখবার   ইচ্ছা।  কিন্তু  আর  সব  পাঞ্জাবিরা  হেমকুন্ড  দেখে  ফিরে  আসবে।  আমরা  তাকে  আমাদের  সঙ্গে  যাবার  সুযোগ দিলে,  তার  ইচ্ছাপুরণ  হয়।  মা,  বোন,  ও  ভগ্নীপতি  ঘাঙরিয়া  গুরুদ্বোয়ারায়  থাকবেন।  ভগ্নীপতি  খুব  অসুস্থ,  তার  হাত,  পা,  সবসময়  কাঁপে।  আমরা  তাকে  আমাদের  সঙ্গে  নিতে  রাজি  হয়ে  গেলাম।

এইসব  জায়গা,  তার  দেশ,  তার  পরিবার,  আরও  বিভিন্ন  বিষয়  নিয়ে,  তার  সাথে  অনেক  কথা  হ’ল।  তীরথ  জানালো,  রাতে  সে  বাসের  নীচে  শোবে।  তাহলে  বৃষ্টি  আসলেও  ভিজবে  না,  বা   কোন  ক্ষতি  হবে  না।  ওর  বুদ্ধি   দেখে  অবাক  হয়ে  বললাম,  রাস্তা   তো  ঢালু,  বৃষ্টি  হলে  ওপর  থেকে  বৃষ্টির  জল  গায়ে  পড়বে  না  বটে,  কিন্তু  ঢালু  রাস্তা  দিয়ে  জল  গড়িয়ে  যাবার  সময়  তুমি  তো  পুরো  ভিজে  যাবে।  ও  কিছুক্ষণ   বোকার   মতো   তাকিয়ে  থেকে   হেসে  ফেললো।  কিছুক্ষণের  মধ্যেই  বৃষ্টি  নামলো।  বাসের  সবার খাওয়া  হয়ে  গেছে।  বৃষ্টিও  খুব  জোরে  হচ্ছে।  চট্  করে  বাস  থেকে  নেমে,  পাশেই  দোকানে  রাতের  খাবার  খেতে  যাওয়ার  জন্য   দৌড়  লাগাবো,  একজন  খৈনী  খেয়ে  জানালা   দিয়ে  থুথু   ফেললো,  ঠিক  আমার  ঘাড়ে,  গলা  ও  জামার  কলারের  মাঝখানে।  ভীষণ  রাগ  হয়ে   গেল।  কিন্তু  এই  বূষ্টিতে  ঝগড়া  করার  সুযোগ  নেই,  মুডও  নেই।  দেখলাম  একটা  কালো  কোট  পরে  একজন  জানালার  ধারে  বসে  আছে।  ঠিক  করলাম  ফিরে  এসে  ব্যবস্থা  করা  যাবে।  ঐ  বৃষ্টিতে  আমার  জামার  কলার  ও  ঘাড়  ভাল  করে  ধুয়ে  ফেললাম।  পুরি  ও  তরকারী  খেয়ে  ছুটে  বাসে  ফিরে  এসে  দেখি,  জানালার  ধারে  কেউ  বসে  নেই।  অপর  দিকের  সিটে  তিনজন  কালো  কোট  পরে  বসে  আছে।  চিনতে  পারলাম  না,  কে  সেই  অপদার্থ।  আস্তে  আস্তে  সবাই  বাসে  ফিরে  এল।  ঘুম  আসার   কোন  সম্ভাবনা   নেই।  কালও  যাওয়া  হবে  কিনা  সন্দেহ।  মহিলারা  দিব্বি  ম্যানেজ  করে  বাসের  মেঝেতে  বা  তিনজনের  জন্য  বসার  পিছনের  দিকের  সিটে  শুয়ে  পড়েছে।  আমি  আর  মাধব  আমাদের  নিজেদের  সিটে  বসে।   দিলীপ  অপর  দিকে  তার  নিজের  সিটে।  একটু কাত  হ’ব,  তার  উপায়  পর্যন্ত  নেই।  আমাদের  সামনের  সিটে,  এক  পাঞ্জাবি  ভদ্রমহিলা   মেঝেতে  একটা   বোঁচকা   পেতে   সিটটাকে  লম্বা  করে   নিয়ে,  পরম  সুখে  শুয়ে  নাক  ডাকাচ্ছেন।  সামনের  সিটের  ওপর  দিয়ে  হান্টার  সু  পরা  পাদু’টো  ঝুলিয়ে  দিয়ে,  একটু  কাত  হয়ে  চোখ  বুজবার  চেষ্টা  করলাম।  বোধহয়  একটু  তন্দ্রা  মতো  এসেছিল,  হঠাৎ  ঘুমটা  ভেঙ্গে  গেল।  দেখি  আমার  হান্টার  সু  পরা  শ্রীচরণদু’টো  সামনের  সিটের  ভদ্রমহিলার  পেটের  ওপর।  তাড়াতাড়ি  উঠে  সোজা  হয়ে  বসলাম।  পিছনের  সিটের  কালো  কোট  পরা  মধ্যপ্রদেশের  লোকগুলো,  এবং  তাদের  সঙ্গী  কতগুলো  মহিলা,  অকারণে  বিকট  শব্দ  করে  হাসছে।  সাধারণ  কথায়  এত  বিপদেও  কিভাবে  তাদের  এত  হাসি  পাচ্ছে  কে  জানে।  একবার  সোজা  হয়ে  বসে,  একবার  সামান্য  কাত  হয়ে,  সময়  কাটাতে  লাগলাম।  সব  কিছুরই  একটা  শেষ  আছে,  রাত্রিও  ক্রমে  শেষ  হয়ে  ভোর  হয়ে  এল।

ভোরের আলোয় দেখলাম, জায়গাটা খুব সুন্দর। একটা মিলিটারি ভাঙ্গাচুরা জীপকে একটা মিলিটারি ট্রাক টেনে নিয়ে যাবার  জন্য  প্রস্তুত।  দিন  দু’এক  আগে  নাকি  একটা  বাসের  সাথে  ধাক্কায়,  জীপটার  এই  হাল  হয়েছে।  জীপের  ড্রাইভার  আলমোড়ার  লোক।  বাসের  ধাক্কায়  জীপটা  একটা  ছয়-সাত  ফুট  গর্তে  পড়ে  যায়।  বাসের  সামনের  চাকা  জীপের  ছাদে  উঠে  গিয়ে  আটকে  যাওয়ায়, গভীর  খাদে  পড়া  থেকে  রক্ষা  পায়।  জীপের  ড্রাইভার  অজ্ঞান  হয়ে  গেলেও,  বিশেষ  কোন  আঘাত  পায়  নি।

এদিক  ওদিক  ঘুরে  ঘুরে  সময়  কাটছে।  অদ্ভুত  একটা  বেগুনি  রঙের  চার  পাপড়ির  ফুল,  চারিদিকে  ফুটে  আছে।  অনেকটা  প্রজাপতির  মতো  দেখতে।  এর  আগে  সমস্ত  রাস্তায়  হালকা  বেগুনি  রঙের  দোপাটির  মতো  একরকম  ফুল  দেখে  আসছিলাম।  এখানে  সে  ফুল  দেখছি  না।  সকাল  ন’টার  সময়  আমরা  দোকানটায়  খাবার  খেতে  গেলে,  দোকানদার  জানালো  পুরি  আর  তরকারী  পাওয়া  যাবে।  আটা  মাখার  সময়  লক্ষ্য  করলাম,  অজস্র  সাদা  রঙের  ছোট  ছোট  পোকা,  আটার  মধ্যে  মনের  সুখে  সংসার   পেতেছে।  অনেকটা  শুঁয়ো  ছাড়া  বাচ্ছা  শুঁয়োপোকার  মতো  দেখতে।  দু’চারটে  আটা  থেকে  বেছে  বেছে  বাইরে  ফেলে  বুঝলাম,  বৃথা   চেষ্টা  করছি।  আটার  থেকে  সম্ভবত  পোকার  পরিমান  বেশি।  ওখান  থেকে  উঠে  এলাম।  পুরি  তৈরি  হলে  গরম  গরম  “আমিষ  পুরি”,  তরকারী  সহযোগে  খেতে  বাধ্য  হলাম। খাবারের  দাম  দেবার  সময়  দোকানদার  আমাদের  থেকে  দাম  নিতে  চাইলো  না,  কারণ  আমরা  নাকি  কিছুই  খাই  নি।  সে  বললো,  এত  অল্প  খাবারের  জন্য  আর  কী  দাম  নেব?  দাম  দিতে  হবে  না।  তাকে  জোর  করে  দাম  দিয়ে  ভাবলাম,  আমরা  ভারতবর্ষেই  আছি  তো?

যাহোক্,  বেলা  দশটা   নাগাদ,  আমরা  আবার  সেই  ধ্বসের  কাছে  এলাম।  ড্রাইভারের  দক্ষতায়  এবারও  আমরা  প্রায়  সবার  আগেই  রইলাম।  চারিদিকে  মহিলারা  স্টোভে  খাবার  তৈরি  করছে।  এরা  সমস্ত  রাত  এখানেই  ছিল।  মাত্র  দু’টাকা  কিলোগ্রাম  দরে  একরকম  স্থানীয়  আপেল,  রাস্তার  পাশে  পাশে  প্রচুর  বিক্রি  হচ্ছে।  অনেক  বাস  আটকে  আছে  বলে  ওরা  এখানে  এসে  জুটেছে।   কিছুটা  সংগ্রহ  করে  রাখলাম।  খুব  হাল্কা  বৃষ্টি  আরম্ভ  হ’ল।  আজ   কিন্তু  কালকের   সেই  মিলিটারি  পাঞ্জাবি  ভদ্রলোক,  আমাদের   রাস্তা   পরিস্কারের  কাজে  হাত  লগাতে  অনুমতি   দিলেন।  শুরু  হ’ল  বৃষ্টিতে  ভিজে  খাদে  পাথর   ঠেলে  ফেলা।  রাস্তা  থেকে  ঠেলে  ফেলা  পাথর,  তলায়  অনেক  নীচে  নদীতে  গড়িয়ে  পড়ছে।  উঃ!  সে  কী  ভয়ঙ্কর  শব্দ। এখানেই   দেখলাম  তীরথ  সিং  এর  ক্ষমতা।  আমরা  সবাই  কাজ  করছি।  তবু  তার  ক্ষমতার  তুলনা  হয় না।  একটা  শাবল  দিয়ে  পাথর  ভেঙ্গে,  একা  খাদে  ঠেলে  ফেলছে।  বেলচা  দিয়ে  রাস্তা  পরিস্কার  করছে।  মাঝে  মাঝে  ডিনামাইট্  দিয়ে  বড়  বড়  পাথর  ভাঙ্গা  হচ্ছে।  তখন  আমাদের  ঐ  জায়গা  থেকে  অনেক  দুরে  চলে  যেতে  বলা  হচ্ছে।  লম্বাটে  গোলাকার  ধুপকাঠির  প্যাকেটের  মতো  পাঁচ-সাতটা  জিনিস,  একসঙ্গে  তার  দিয়ে  জড়িয়ে  বড়  বড়  পাথরের  ওপর  রাখা  হচ্ছে,  এবং  পাহড়ের  ধার  থেকে  ভিজে  মাটি  নিয়ে  তার  ওপর  ভাল  করে  চাপা  দিয়ে   ঢেকে  দেওয়া  হচ্ছে।  এরকম  অনেকগুলো  বান্ডিল  বিভিন্ন বড়  বড়  পাথরের  ওপর  রেখে, প্রত্যেকটার  সঙ্গে  তার  যোগ  করে,  বেশ  কিছুটা  দুর  থেকে  ঐ  মিলিটারি পাঞ্জাবি  ভদ্রলোক  ওগুলোকে  ব্লাষ্ট্  করাচ্ছেন।  আমার  মনে  হ’ল  পাথরগুলো  ভাঙ্গতে  গেলে ডিনামাইটগুলো তো  বড়  পাথরের  তলায়  রাখা  উচিৎ,  তাছাড়া  বারুদ  জাতীয়  যেকোন  জিনিস  তো  রোদে  দেওয়া  হয়, যাতে  সেগুলো  ভালভাবে  ফাটে।  এ  ক্ষেত্রে  বান্ডিলগুলো  পাথরের  ওপর  রেখে,  পাঁক  জাতীয়  কাদামাটি  চাপা  দেবার  কারণ  কী  ভদ্রলোককে   জিজ্ঞাসা  করায়,  তিনি  শুধু  বললেন  এটাই  সিস্টেম।  ওগুলো  কী ভাবে  ভদ্রলোক  ব্লাষ্ট  করাচ্ছেন  দেখার  খুব  ইচ্ছা  থাকলেও,  অনেক  দুরে  গিয়ে  তাঁর  নির্দেশে  দাঁড়াতে  হচ্ছে।  বৃষ্টির  মধ্যে  প্রথমবার  তাঁর  নির্দেশে  অনেকটা  দুরে  মনক্ষুন্ন  হয়ে  রাস্তার  ধারে  দাঁড়িয়ে,  ঘাড়  উচু  করে,  তিনি  কিভাবে  ব্লাষ্ট  করাচ্ছেন  দেখবার  চেষ্টা  করছি।  একটু  পরে  দেখি  তিনি  বাঁশি  বাজিয়ে  আমাদের  আরও  দুরে  চলে  যেতে  বলে,  নিজে  দৌড়ে  অনেকটা  দুরে  গিয়ে  দাঁড়ালেন।  আমরা  অপেক্ষা  করছি।  বেশ  কিছুক্ষণ  পরে  খাদের  ওপারের  পাহাড়  থেকে  মনে  হ’ল  বিকট  একটা  বোমা  ফাটার  আওয়াজ  হ”ল।  আমরা  চমকে  উঠতেই, আমাদের  ঠিক  পাশে  উচু  পাহাড়টা   থেকে  আবার  সেই আওয়াজ।  মনে  হ’ল  খাদে  পড়ে  যাব।  সঙ্গে  সঙ্গে  আবার  খাদের  ওপার   থেকে  আওয়াজ।  এইভাবে  বেশ  কয়েকবার  প্রতিধ্বনি  হয়ে  সব  নীরব।

যাহোক,  ডিনামাইট  দিয়ে  ব্লাষ্ট  করাবার  পরে  আমরা  এগিয়ে  এসে  আবার  সেই  ভাঙ্গা  পাথর  তলায়  ফেলছি,  ফেলছি  কিন্তু  নিজেদেরই  স্বার্থে।  যত  তাড়াতাড়ি  রাস্তা  পরিস্কার  হবে,  তত  তাড়াতাড়ি  আমরা  এই  মরণফাঁদ  থেকে  মুক্তি  পাব।  বৃষ্টি  আবার  বেশ  জোরে  নামলো।  আমরা  পাথরের  আড়ালে  দাঁড়িয়ে  নিজেদের  বৃষ্টির  হাত  থেকে  বাঁচাবার  চেষ্টা  করছি।  জামাপ্যান্ট  ভিজছে,  তবে  খুব  অল্প।  তীরথ  কিন্তু  বৃষ্টিতেও  কাজ  করে  গেল।  ইচ্ছা  থাকলেও  আমাদের  কাজ  করার  উপায়  নেই।  কারণ  আমাদের  সঙ্গে  অতিরিক্ত  জামাপ্যান্ট  নেই।  পাঞ্জাবিরা  অনেক  বেশী  পরিশ্রম  করলো।  আমাদেরও  হাতের  অনেক  জায়গায়  কেটে  গেছে।  কিন্তু  মুশকিল  হ’ল, পাথর  যত  তলায়  ঠেলে  ফেলা  হচ্ছে,  সেগুলো  তত  ভাঙ্গা  রাস্তাকে  সঙ্গে  করে  নিয়ে  তলায়  নামছে।  ফলে  ঐ  জায়গায়  রাস্তা  আরও  সরু  হচ্ছে।  এবার  একজন  স্থানীয়  ছেলে  খাদের  দিকে  কিছুটা  নেমে,  ভাঙ্গা  রাস্তার  খাদের  দিকটায়,  কী  অদ্ভুত  কায়দায়  পাথরের  দেওয়াল  তৈরি  করে  দিল।  এটাকে  এখানকার  লোকেরা   দেখলাম  “পাক্কা  রাস্তা”  বলে।  রাস্তা  একটু  পরিস্কার  হতেই,  ধ্বসের  ওদিক  থেকে  গোটা   দু’তিন   মোটর  সাইকেল,  এপারে  আমাদের  দিকে  চলে  এল।  প্রতি  মোটর  সাইকেলে  দু’জন  করে  যুবক  যাত্রী,  হাতে  একগোছা  ফুল।  শুনলাম  এগুলোই  নাকি  ব্রহ্মকমল।  কী  আনন্দই  যে  হ’ল,  আমরা  তাহলে  ফুলের  দেশে  প্রায়  এসে  গেছি।

শেষ  পর্যন্ত  বিকেল  সাড়ে  চারটের  সময়, আমাদের  দিক  থেকে  প্রথম  একটা  মিলিটারি  জীপ, ওপারে গিয়ে  রাস্তা  উদ্বোধন  করলো। তারপর  সমস্ত  বাস  যাত্রীদের  বাস  থেকে  নামিয়ে,  একে  একে  সমস্ত ফাঁকা  বাস,  খুব  ধীর  গতিতে  ধ্বসের  ওপারে  চলে  গেল।  ওপারে গিয়ে  দেখি,  ওপারের  যাত্রীদের  খুব  করুণ অবস্থা।  তাদের  আগে  ছাড়া  হয়নি  বলে  তাদের  খুব  দুঃখ।  তবে  এদের  গতকাল  রাতে খাবার  জুটেছে, কারণ  সামনেই  দু’একটা  দোকান  আছে।  খবর  পেলাম  গতকাল  রাতে  এদিকের  দোকান  থেকে আমাদের ওদিকের  কিছু যাত্রী  খাবার  কিনে  নিয়ে  গেছিল।  আগের  দিনের  ক্ষুধার্ত,  তৃষ্ণার্ত,  বৃদ্ধ  ভদ্রলোককে  কোথাও   দেখলাম  না।

আমরা  আমাদের  বাসে  উঠে  বসলাম।  সমস্ত  পাঞ্জাবিরা  আমাদের  খুব  প্রশংসা  করছিল।  তারা  সবাইকে  বলছে  যে,  আমরা  রাস্তা পরিস্কারের  জন্য  খুব  কাজ  করেছি।  এরপর  থেকে  তারা  সবাই  আমাদের  তিনজনকে  তাদের  দলভুক্ত  করে  ফেললো।  বিশেষ  করে   সেই  তীরথ  সিং।  সন্ধ্যা   নাগাদ  আমরা  যোশীমঠে  এসে  পৌঁছলাম।  আজ  সন্ধ্যায়  বাস  আর  যাবে  না,  কারণ  আজ  বাস  কোনমতেই বদ্রীনারায়ণ  পৌঁছতে  পারবে  না।  মাঝপথে  যদিও  গোবিন্দঘাট,  কিন্তু  সেখানে  রাত্রে  থাকার  জায়গার  অভাব,  তাই  যোশীমঠেই থাকতে  হ’ল।  চারিদিকে  ঘন  কুয়াশায়  ঢেকে  গেছে।  এক  হাত  দুরের  জিনিসও  দেখা  যাচ্ছে  না।

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2 thoughts on ““পাহাড়ের রোজনামচা” — (প্রথম পর্ব) (www.amaderchhuti.com ও Tour & Tourists পত্রিকায় ধারাবাহিক ভাবে প্রকাশিত)

  1. বাঃ দারুন সুন্দর অভিজ্ঞতা।এখানে থেমে গেলে কেন?এরপর কি হল জানতে ইচ্ছা করছে তো ।

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